बड़ी खबर: ‘TOK’ के कट्टर समर्थक संतोष पांडे ने पैनल नंबर 1 से भरा नामांकन, टिकट न मिलने पर पार्टी से जताई नाराजगी

शौर्य टाईम्स : नीतू विश्वकर्मा
राजनीतिक गलियारों में उस वक्त हलचल मच गई जब ‘टी ओ के’ (TOK) के वरिष्ठ और वफादार समर्थक तथा हिंदी भाषी फाउंडेशन के अध्यक्ष संतोष पांडे ने आज चुनाव के लिए अपना पर्चा दाखिल कर दिया। संतोष पांडे ने पैनल नंबर 1 से अपना नामांकन भरा है, लेकिन सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि वे किसी पार्टी के बैनर तले नहीं, बल्कि निर्दलीय (Independent) उम्मीदवार के तौर पर चुनाव मैदान में उतरे हैं।

पार्टी से बगावत: “मौका नहीं मिला, इसलिए निर्दलीय लड़ूँगा”
नामांकन दाखिल करने के बाद मीडिया से मुखातिब होते हुए संतोष पांडे ने अपनी नाराजगी खुलकर जाहिर की। उन्होंने आरोप लगाया कि पार्टी के प्रति उनकी कट्टर वफादारी के बावजूद उन्हें नजरअंदाज किया गया। पांडे ने कहा:
“मैं पार्टी का सच्चा सिपाही रहा हूँ, लेकिन इस बार मुझे टिकट नहीं दिया गया और न ही काम करने का उचित मौका मिला। कार्यकर्ताओं की भावनाओं और जनता की मांग को देखते हुए मैंने आज निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में अर्ज भरा है।”
प्रमुख बिंदु: क्यों अहम है संतोष पांडे का चुनाव लड़ना?
- वफादारी का सवाल: वर्षों तक TOK के प्रति वफादार रहने के बाद उनका यह कदम स्थानीय समीकरणों को बिगाड़ सकता है।
- पैनल नंबर 1 का मुकाबला: संतोष पांडे के पैनल नंबर 1 से उतरने के कारण अब मुकाबला त्रिकोणीय होने के आसार हैं।
- हिंदी भाषी वोट बैंक: हिंदी भाषी फाउंडेशन के अध्यक्ष होने के नाते, उनका एक बड़ा व्यक्तिगत जनाधार है, जो चुनावी नतीजों को प्रभावित कर सकता है।
आगे क्या?
संतोष पांडे के इस कदम से विपक्षी खेमों में जहाँ उत्साह है, वहीं पार्टी के भीतर डैमेज कंट्रोल की कोशिशें शुरू हो गई हैं। अब देखना यह होगा कि क्या पार्टी उन्हें मनाने में सफल होती है या पांडे निर्दलीय लड़कर अपनी ताकत का लोहा मनवाएंगे



