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उल्हासनगर की राजनीति में बड़ा सवाल: “जिन्होंने किया था हमला, आज वही शिवसेना शिंदे गुट में स्वागत योग्य कैसे?”

शौर्य टाईम्स : नीतू विश्वकर्मा

📍 उल्हासनगर की राजनीति एक बार फिर जबरदस्त विवादों और सवालों के केंद्र में आ गई है। वर्ष 2022 में महाराष्ट्र की राजनीति में हुए ऐतिहासिक सत्ता संघर्ष के दौरान कल्याण लोकसभा सांसद डॉ. श्रीकांत शिंदे के कार्यालय पर हुए हमले और तोड़फोड़ की घटना को लेकर अब नया राजनीतिक बवाल खड़ा हो गया है।


जिस घटना को उस समय “शिवसेना शिंदे गुट पर हमला” और “हिंदुत्व विरोधी कृत्य” बताया गया था, आज उसी प्रकरण से जुड़े कथित पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं का शिंदे गुट में प्रवेश राजनीतिक गलियारों में कई गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। ⚠️

क्या था पूरा मामला? 📰

जून 2022 में महाराष्ट्र में तत्कालीन शिवसेना नेता एकनाथ शिंदे की बगावत के बाद राज्य की राजनीति में भारी उथल-पुथल मची हुई थी। उसी दौरान उद्धव ठाकरे गुट के कार्यकर्ताओं द्वारा उल्हासनगर स्थित सांसद डॉ. श्रीकांत शिंदे के केंद्रीय कार्यालय पर हमला किया गया था।


घटना के दौरान कार्यालय पर नारेबाजी, पथराव और तोड़फोड़ हुई थी। पुलिस ने तत्काल हस्तक्षेप कर कई लोगों को हिरासत में लिया था। इस मामले में कई स्थानीय पदाधिकारियों पर FIR दर्ज की गई थी। बाद में मुख्य आरोपियों में शामिल बताए गए कुछ लोगों पर प्रशासन द्वारा तडीपारी जैसी कार्रवाई भी की गई थी।
उस समय शिंदे गुट के नेताओं ने इस घटना को “हिंदुत्व और शिवसैनिक स्वाभिमान पर हमला” बताया था। 🚨

अब क्यों उठ रहे हैं सवाल? 🤔

हाल ही में कल्याण जिल्हा प्रमुख गोपाळजी लांडगे साहेब यांच्या हस्ते आयोजित कार्यक्रम में उ.बा.ठा. गुट के कॅम्प नंबर 1 के शाखा प्रमुख संतोष कणसे, उपशाखा प्रमुख प्रमोद पांडे तथा अन्य पदाधिकारी और कार्यकर्ताओं ने शिवसेना शिंदे गुट में प्रवेश किया।


इस कार्यक्रम में महानगर प्रमुख नगरसेवक राजेंद्र चौधरी, उपजिल्हाप्रमुख दिलीप गायकवाड, शहर प्रमुख निलेश देशमुख, उपशहर प्रमुख सुरेश सोनवणे, युवा सेना विधानसभा संपर्क प्रमुख तुषार बांदल और विभाग संघटक आदेश पाटील समेत कई नेता उपस्थित थे।


लेकिन राजनीतिक चर्चा का केंद्र यह बन गया कि जिन लोगों पर पहले विरोध, हमला और तोड़फोड़ के आरोप लगे थे, क्या अब वही लोग “स्वागत योग्य शिवसैनिक” बन गए हैं? ❓

विपक्ष और स्थानीय कार्यकर्ताओं के तीखे सवाल ⚡

स्थानीय राजनीतिक हलकों और शिवसैनिकों के बीच अब कई सवाल खुले तौर पर पूछे जा रहे हैं:

  • क्या सत्ता विस्तार के लिए पुराने विवाद भुला दिए गए?
  • क्या FIR और गंभीर आरोप अब राजनीतिक समझौते में महत्वहीन हो गए?
  • क्या “चुकीला माफी नहीं” का सिद्धांत सिर्फ भाषणों तक सीमित रह गया?
  • क्या आनंद दिघे साहेब के कठोर हिंदुत्व और अनुशासन की विचारधारा से समझौता किया जा रहा है?
  • जिन कार्यकर्ताओं ने उस समय विरोध किया था, उन्हें अब पार्टी में सम्मानजनक स्थान क्यों दिया जा रहा है?

इन सवालों ने शिंदे गुट की अंदरूनी रणनीति और राजनीतिक मजबूरियों को लेकर नई बहस छेड़ दी है। 🧩

राजनीतिक विश्लेषकों की क्या राय है? 📊

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि महाराष्ट्र में स्थानीय निकाय चुनावों और संगठन विस्तार को देखते हुए शिंदे गुट लगातार अपने जनाधार को मजबूत करने में जुटा हुआ है।


उल्हासनगर, कल्याण और ठाणे बेल्ट में शाखाओं, पदाधिकारियों और स्थानीय प्रभावशाली चेहरों को अपने साथ जोड़ना वर्तमान राजनीतिक रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।


हालांकि, पार्टी के पुराने और कट्टर समर्थकों के बीच यह संदेश भी जा रहा है कि “राजनीति में स्थायी दुश्मन नहीं होते”, लेकिन इससे वैचारिक प्रतिबद्धता और कार्यकर्ताओं की भावनाओं पर असर पड़ सकता है। ⚠️

क्या हिंदुत्व की राजनीति पर पड़ रहा असर? 🚩

शिवसेना की राजनीति हमेशा “निष्ठा”, “शाखा संस्कृति” और “हिंदुत्ववादी आक्रामकता” के आधार पर खड़ी रही है। ऐसे में जिन लोगों पर पहले हमला और विरोध के आरोप लगे, उन्हीं को बाद में पार्टी में शामिल करना कई शिवसैनिकों को असहज कर रहा है।


स्थानीय स्तर पर यह चर्चा तेज हो गई है कि क्या अब विचारधारा से ज्यादा “राजनीतिक गणित” महत्वपूर्ण हो गया है?
उल्हासनगर की राजनीति में यह मामला आने वाले समय में और बड़ा विवाद बन सकता है। 🔥

Shaurya Times

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