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पानी महंगा, नदी प्रदूषित? उल्हासनगर में जलदर वृद्धि पर बवाल — 25% सीवेज के बीच बढ़े बिल, जवाबदेही किसकी? महिला जनप्रतिनिधियों की भूमिका पर चर्चा?

शौर्य टाईम्स : नीतू विश्वकर्मा

उल्हासनगर महानगरपालिका द्वारा हाल ही में पानी के बिलों में वृद्धि किए जाने के निर्णय ने शहर में नई बहस छेड़ दी है। जानकारी के अनुसार, महानगरपालिका महाराष्ट्र औद्योगिक विकास निगम (MIDC) से पानी खरीदकर नागरिकों को आपूर्ति करती है।


लेकिन इसी बीच यह सवाल जोर पकड़ रहा है कि यदि उल्हास नदी में लगभग 25 प्रतिशत पानी सीवेज और अशुद्ध जल से प्रभावित बताया जा रहा है, तो प्रदूषण कम करने की दिशा में महानगरपालिका की जिम्मेदारी क्या तय की गई है?

जनता के मुख्य सवाल?

  • जब नदी में बड़ी मात्रा में सीवेज प्रवाह हो रहा है, तो उसे रोकने या कम करने के लिए क्या ठोस कदम उठाए गए हैं?
  • क्या शहर में पर्याप्त क्षमता वाले सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (STP) कार्यरत हैं?
  • क्या जल शुद्धिकरण प्रक्रिया और गुणवत्ता की रिपोर्ट सार्वजनिक की जा रही है?
  • क्या पानी दर वृद्धि से पहले नागरिकों के साथ कोई सार्वजनिक चर्चा या सुनवाई की गई?
  • क्या प्रदूषण कम करने और जल संरक्षण के लिए कोई समयबद्ध कार्ययोजना घोषित की गई है?

“हमारा ही सीवेज, फिल्टर कर हमें?” — नागरिकों में आक्रोश

नागरिकों के बीच यह भावना भी सामने आ रही है कि शहर का ही अपशिष्ट जल ट्रीटमेंट के बाद दोबारा आपूर्ति किया जा रहा है, और इसके बावजूद पानी दरों में वृद्धि की जा रही है।
विशेषज्ञों का कहना है कि अपशिष्ट जल का वैज्ञानिक शोधन एक सामान्य प्रक्रिया है, लेकिन इसकी गुणवत्ता, पारदर्शिता और निगरानी सुनिश्चित करना प्रशासन की प्राथमिक जिम्मेदारी है।

महिला जनप्रतिनिधियों की भूमिका पर चर्चा

पानी जैसे संवेदनशील और दैनिक जीवन से जुड़े मुद्दे पर शहर की महिला जनप्रतिनिधियों की भूमिका को लेकर भी चर्चा हो रही है।
महानगरपालिका में महिला आयुक्त द्वारा प्रस्ताव लाया गया, महिला महापौर की अध्यक्षता में पारित हुआ, और वर्तमान में 44 महिला नगरसेविकाएं सदन में मौजूद हैं।


शहर की बड़ी संख्या में महिला मतदाता यह जानना चाहती हैं कि —
पानी दर वृद्धि और नदी प्रदूषण जैसे मुद्दों पर उनकी जनप्रतिनिधियों की स्पष्ट भूमिका क्या है?

जवाबदेही और पारदर्शिता की मांग

पानी केवल एक सेवा नहीं, बल्कि जीवन का आधार है।
ऐसे में नागरिकों की मांग है कि —

  • जल गुणवत्ता की नियमित जांच रिपोर्ट सार्वजनिक की जाए
  • सीवेज प्रवाह कम करने के लिए सख्त कदम उठाए जाएं
    अवैध
  • नालों और औद्योगिक अपशिष्ट पर कार्रवाई हो
    पानी
  • दर वृद्धि का विस्तृत गणित सार्वजनिक किया जाए
    जनसुनवाई के माध्यम से नागरिकों की राय ली जाए

अब सबसे बड़ा प्रश्न

जब नदी प्रदूषण की चुनौती सामने है, तब क्या केवल दर वृद्धि ही समाधान है?
या फिर प्रशासन को पहले नदी की स्वच्छता, शोधन क्षमता और पारदर्शिता पर ध्यान देना चाहिए?


शहर अब स्पष्ट जवाब और ठोस कार्यवाही की प्रतीक्षा में है।

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