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उल्हासनगर गोलीकांड: मृत युवकों पर FIR दर्ज कर पुलिस ने उठाए सवालों के घेरे में, राजनीतिक दबाव का आरोप!

शौर्य टाईम्स : नीतू विश्वकर्मा

उल्हासनगर (महाराष्ट्र): कैलाश कॉलोनी में २० मई को हुए नृशंस गोलीबार में दो युवक भाई अनिल चौहान (२२) और अमन चौहान (१७) की मौत हो चुकी थी। उनके चाचा अर्जुन चौहान गंभीर रूप से घायल हुए। घटना के लगभग दो सप्ताह बाद ४ जून को हिल लाइन पुलिस स्टेशन ने एक प्रेस नोट जारी कर मृतकों के सहयोगियों या संबंधित पक्ष पर FIR दर्ज करने की जानकारी दी। यह कदम जनता के बीच तीखी बहस और सवालों का विषय बन गया है।

घटना क्या थी?

दीपक ठाकुर (जो खुद शिकायतकर्ता हैं) के कार्यालय के बाहर हुए हमले में दो युवकों की मौत हुई थी। प्रारंभिक जांच में पुरानी रंजिश और खंडणी संबंधी विवाद को वजह बताया गया। दीपक ठाकुर की शिकायत पर आरोपी पक्ष (अजय राव समेत अन्य) के खिलाफ FIR पहले दर्ज हुई। पुलिस ने कुछ आरोपियों को गिरफ्तार भी किया।


लेकिन अब पुलिस ने मृत युवकों के पक्ष (अजय नरेश राव, किशोर चौहान आदि) के खिलाफ अलग FIR दर्ज की है। प्रेस नोट में भारतीय न्याय संहिता की विभिन्न धाराओं और आर्म्स एक्ट के तहत मामला दर्ज किया गया है।

जनता के सवाल पुलिस पर:

  • मृतकों पर FIR क्यों? जब दो युवक गोलीबार में जान गंवा चुके थे, तब उनके खिलाफ FIR दर्ज करने का क्या औचित्य है?
  • देर क्यों? गोलीबार से पहले या तुरंत बाद क्यों नहीं की गई कार्रवाई? क्या FIR दर्ज करने में राजनीतिक दबाव काम कर रहा है?
  • क्या पुलिस एक पक्ष को बचाने और दूसरे पक्ष पर दबाव बनाने का प्रयास कर रही है?

स्थानीय लोगों और मृतकों के परिवारवालों ने पुलिस पर राजनीतिक प्रभाव का आरोप लगाया है। कुछ रिपोर्ट्स में सागर पाटील समेत स्थानीय नेताओं के नाम भी जुड़े हैं। परिवार का कहना है कि पहले की शिकायतों पर पुलिस ने ध्यान नहीं दिया, जिससे यह घटना हुई।

पुलिस का रवैया संदिग्ध क्यों?

पुलिस का तर्क है कि दोनों पक्षों के बीच पुरानी रंजिश थी और क्रॉस केस दर्ज हुए हैं। लेकिन आलोचकों का सवाल जायज है — क्या मर चुके लोगों को आरोपी बनाकर न्याय की प्रक्रिया को प्रभावित किया जा रहा है? क्या यह राजनीतिक संरक्षण प्राप्त गिरोहों को बचाने की कोशिश है?


यह मामला महाराष्ट्र पुलिस की निष्पक्षता पर सवाल खड़ा करता है। जब पीड़ित परिवार न्याय की गुहार लगा रहा है, तब पुलिस का यह कदम पीड़ितों को ही आरोपी बनाने जैसा प्रतीत हो रहा है।

जनता की मांग:

  • पूरे मामले की CID या CBI जांच हो।
  • राजनीतिक दबाव के आरोपों की स्वतंत्र जांच हो।
  • पुलिस अधिकारियों पर जवाबदेही तय की जाए।

यह घटना आम नागरिकों में पुलिस व्यवस्था के प्रति अविश्वास बढ़ा रही है। क्या कानून व्यवस्था राजनीतिक दलों के इशारे पर चल रही है? उल्हासनगर के इस मामले पर नजर रखना जरूरी है।
सच की आवाज को दबाया नहीं जा सकता। जनता जागरूक रहे और न्याय की मांग करती रहे।


स्रोत: स्थानीय समाचार रिपोर्ट्स, पुलिस प्रेस नोट (०४-०६-२०२६) और घटना संबंधी उपलब्ध जानकारी।

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