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क्या बीजेपी के बाद अब – ‘शिवसेना’ बन गई है ‘वॉशिंग मशीन फैक्ट्री’? ज्वेलरी स्मगलिंग मामले में हुई गिरफ्तारी पर सियासी संग्राम और गंभीर सवाल!

शौर्य टाईम्स : नीतू विश्वकर्मा

उल्हासनगर: ग्रेटर नोएडा में 2 करोड़ रुपये से अधिक की गोल्ड स्मगलिंग मामले में एक साल पुराने केस में यूपी पुलिस द्वारा अचानक की गई कार्रवाई ने महाराष्ट्र के उल्हासनगर में सियासी भूचाल ला दिया है। उल्हासनगर कोर्ट से चार आरोपियों को जमानत मिलने के बाद अब इस मामले में ‘माहेरा’ नामक स्मगलिंग गैंग और स्थानीय स्तर पर राजनीतिक संरक्षण के गंभीर आरोप लग रहे हैं।

FIR में दर्ज पूरा मामला

ग्रेटर नोएडा के जेवर थाना में 11 नवंबर 2025 को दर्ज FIR नंबर 0376 के अनुसार, शिकायतकर्ता राजविंदर सिंह (उल्हासनगर-4 निवासी) ने आरोप लगाया कि मार्च 2025 में उन्होंने विक्की काटेजा (पिता: मोतूमल काटेजा) और संतोष चौहान (पिता: राजू चौहान) को लखनऊ से कीमती सामान (सोना-जेवरात) लाने भेजा था।


आरोप है कि 10 मार्च 2025 को आलमबाग से दिल्ली जा रही बस में दोनों आरोपी और एक बुर्का पहने अज्ञात महिला तथा उनके साथियों ने मिलकर शिकायतकर्ता का बैग चुरा लिया, जिसमें महंगे सामान थे। FIR में भारतीय न्याय संहिता की धारा 306 के तहत मामला दर्ज किया गया।

क्या है पूरा मामला?

मिली जानकारी के अनुसार, यूपी पुलिस ने एक साल पुराने मामले में अचानक उल्हासनगर-4 निवासी चार लोगों को गिरफ्तार किया था। आरोप है कि यह सभी लोग गोल्ड स्मगलिंग से जुड़े थे। हालांकि, कोर्ट ने इस गिरफ्तारी प्रक्रिया को अनुचित मानते हुए सभी चार आरोपियों को जमानत दे दी है।

आरोपियों के चौंकाने वाले दावे

इस मामले में आरोपी कमल पंजाबी और दो महिलाओं सहित अन्य ने अपने ऊपर लगे आरोपों को सिरे से खारिज किया है। महिलाओं ने आरोप लगाया है कि वे पहले ‘माहेरा’ नामक स्मगलर के गैंग के साथ काम करती थीं, लेकिन जब उन्होंने स्मगलिंग का काम करने से इनकार कर दिया, तो माहेरा ने उन्हें झूठे केस में फंसा दिया।


आरोप यह भी है कि यूपी पुलिस ने पूछताछ के दौरान मारपीट की और इस पूरी कार्रवाई का खर्च (फ्लाइट यात्रा और होटल का बिल) स्मगलर माहेरा ने उठाया।

सियासी हस्तक्षेप पर खड़े हुए सवाल?

इस मामले में सबसे चौंकाने वाला पहलू वह ‘सपोर्टिंग सिस्टम’ है जो गिरफ्तारी के बाद सक्रिय हो गया। जमानत की सुनवाई के दौरान उल्हासनगर के महापौर (मेयर) और गुट नेता (पार्टी पदाधिकारी) आधी रात को ही बचाव के लिए मैदान में उतर आए।
इस सक्रियता ने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं:


क्या शिवसेना के पदाधिकारी को बचाने के लिए सरकारी तंत्र और स्थानीय सत्ता का दुरुपयोग किया गया?


उल्हासनगर में एडवोकेट सरिता खनचंदानी केस और महिलाओं को अर्धनग्न अवस्था में शाखा तक ले जाने जैसे संगीन मामले आज भी पेंडिंग हैं, जहाँ पीड़ित न्याय के लिए भटक रहे हैं। तो फिर इस मामले में इतनी तत्परता क्यों दिखाई गई?


क्या राजनीतिक रसूख के कारण अब गंभीर अपराध भी ‘वॉशिंग मशीन’ की तरह साफ हो रहे हैं?

आगे की राह

फिलहाल कोर्ट ने यूपी पुलिस की कार्यशैली पर फटकार लगाते हुए जांच को लेकर संशय जाहिर किया है। लोगों का मानना है कि इस मामले की उच्च स्तरीय निष्पक्ष जांच होनी चाहिए ताकि यह स्पष्ट हो सके कि क्या पुलिस वास्तव में अपराधियों को पकड़ रही है या फिर किसी सोची-समझी साजिश का हिस्सा बन रही है।


इस मामले में आगे की जांच ही यह स्पष्ट कर पाएगी कि कानून के गलियारों में छिपे असली अपराधी कौन हैं और किसे राजनीतिक संरक्षण प्राप्त है।


क्या आपको इस मामले से जुड़ी कानूनी प्रक्रियाओं या एफआईआर की धाराओं के बारे में और अधिक जानकारी चाहिए?

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